यूएन कार्यालय की प्रवक्ता रवीना शमदासानी ने शुक्रवार को जिनीवा में पत्रकारों को जानकारी देते हुए बताया कि आतंकवादी कृत्यों की रोकथाम के लिए मौजूदा क़ानून बेहद कठोर है, जिसे हटाकर अब नए, संशोधित क़ानून पर संसद में विचार-विमर्श हो रहा है.
उन्होंने कहा कि आतंकवाद की रोकथाम पर केन्द्रित मौजूदा क़ानून को निरस्त किया जाना, श्रीलंका की आन्तरिक सुरक्षा के लिए एक अर्थपूर्ण सुधार की दिशा में क़दम बढ़ाने का अवसर होना चाहिए था.
मगर, प्रस्तावित नए क़ानून से केवल मानवाधिकार हनन के पुराने रुझान ही जारी रहने की आशंका है.
रवीना शमदासानी ने कहा कि प्रस्तावित क़ानून, उन पुराने मसौदों की तरह ही है, जिन्हें व्यापक आलोचना के बाद वापिस ले लिया गया था.
‘कठोर प्रावधान’
उदाहरणस्वरूप, इसमें आतंकवादी कृत्यों की मोटे तौर पर व्याख्या की गई है, हिरासत में रखे जाने के क़ानूनी औचित्य को चुनौती देने समेत न्यायिक गारंटी के सीमित अवसर हैं.
साथ ही, मानवाधिकार आयोग द्वारा हिरासत केन्द्रों का दौरा करने की योग्यता पर अंकुश लगाए जाने समेत क़ानून में अन्य चिन्ताजनक प्रावधान हैं.
मानवाधिकार कार्यालय प्रवक्ता ने सचेत किया कि यदि इस क़ानून को मौजूदा स्वरूप में पारित किया जाता है, तो इससे कार्यपालिका को मानवाधिकारों पर अंकुश लगाने के लिए विशाल शक्तियाँ मिल जाएंगी.
ऐसी शक्तियों का दुरुपयोग किए जाने से बचाव के लिए सीमित या ना के बराबर रक्षा उपाय होंगे.
रवीना शमदासानी ने कहा कि यह उन क़ानूनी आधार को भी कमज़ोर करेगा, जिनकी आवश्यकता सुरक्षा बलों को बिना वॉरन्ट गिरफ़्तारी के लिए होती है.
“इसमें मुक़दमे की कार्रवाई से पहले लम्बे समय तक हिरासत में रखे जाने की भी अनुमति है.”
इसके मद्देनज़र, यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय ने श्रीलंका सरकार से नागरिक समाज व अन्य हितधारकों के साथ अर्थपूर्ण विमर्श पर बल दिया है, ताकि क़ानून के मसौदे में ज़रूरी बदलाव लाकर, उसे अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानूनों के अनुरूप बनाया जा सके.