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The Great India Story: इलाका तुम्हारा, धाक हमारा, चीन को काउंटर और अमेरिका को झटका, ‘वैश्विक चौधरी’ को उसके घर में घेरने की तैयारी में भारत

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भारत ने अपनी नीति में बड़ा बदलाव कर दिया है और चीन को पटखनी देने में हर उस कोने तक पहुंच रहा है जहां वो अपनी पैठ बनाने की कोशिश में लगा है। चीन की नजर अभी लैटिन अमेरिका के क्षेत्र पर पड़ी है।

अमेरिका का यही मकसद हमेशा से रहा है कि वो दुनिया का सर्वे-सर्वा बना रहे। अमेरिका इस बात को तो कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई भी देश उसके आसपास भी आए। अमेरिका को ये टेंशन कई मामलों को लेकर रहती है। फिर चाहे स्पेस सेक्टर की बात हो या फिर डिफेंस जिसमें इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट शामिल है। या फिर किसी हथियार की खरीद-फरोख्त। अमेरिका चाहता है कि सबकुछ उसके इशारे पर हो। अमेरिका अपने व्यापार को बढ़ाने के लिए किसी भी हद तक चला जाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध तो जैसे अमेरिका के लिए हथियार की लाइव टेस्टिंग सरीखा है। हालांकि भारत सारी चीजों को काफी नजदीक से देख और महसूस भी कर रहा है। लेकिन अब भारत ने अमेरिका के समीप ऐसा खेल रच दिया है जिसके जरिए वो सुपर पावर मुल्क को उसी के घर में घेरने में सफल नजर आ रहा है। भारत ने अपनी नीति में बड़ा बदलाव कर दिया है और चीन को पटखनी देने में हर उस कोने तक पहुंच रहा है जहां वो अपनी पैठ बनाने की कोशिश में लगा है। चीन की नजर अभी लैटिन अमेरिका के क्षेत्र पर पड़ी है। लेकिन चीन को ये अंदाजा नहीं होगा कि जिस लैटिन अमेरिका पर वो घात लगाकर बैठा है अब भारत भी वहां पहुंचने वाला है। और ऐसे पहुंचेगा कि चीन के बाजार को पलभर में ऐसी चोट मिलेगी जिसे वो वर्षों नहीं भूल पाएगा। 

अमेरिका के पड़ोस में भारत की रणनीतिक पहुंच

लैटिन अमेरिकी क्षेत्र में भारतीय राजनेताओं की दिलचस्पी भी कम ही रही है और यहां का दौरा भी बेहद सीमित ही किया गया है। लेकिन हाल ही में विदेश राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी ने 13-20 जनवरी तक क्यूबा, ग्वाटेमाला, अल साल्वाडोर और बोलिविया की आधिकारिक यात्रा करते हुए  भारत के द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न आयामों पर चर्चा की। इससे पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अगस्त 2022 में लैटिन अमेरिका व कैरेबियाई देशों के राजदूतों से मुलाकात की तथा समग्र द्विपक्षीय संबंधों को बढ़ावा देने पर जोर दिया। बता दें कि अमेरिका भले ही चीन के विरोध का ढोल पूरी दुनिया में पीटता रहता है लेकिन शाश्वत सत्य ये है कि चीन ने लैटिन अमेरिका में जमकर निवेश किया है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार 2000 से 2018 के बीच चीन ने लैटिन अमेरिका में कच्चे माल के रूप में 73 अरब डॉलर का निवेश किया। 2015 की जनवरी में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आने वाले एक दशक में लैटिन अमेरिका में 250 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की थी। वैसे तो ये पूरा इलाका अमेरिका के प्रभाव वाला माना जाता है। लेकिन अब भारत की कोशिश इस क्षेत्र में चीन को काउंटर करने के साथ ही अमेरिका को भी चौकाने की है। 

2021-22 में 400 अरब डॉलर के सामान का निर्यात 

परंपरागत रूप से, भारत की विदेश नीति केवल एशिया-प्रशांत और सामरिक भागीदारों तक ही सीमित थी। लेकिन हाल के दिनों में दुनिया की सबसे पुरानी-सभ्यता विश्वभर की अस्पष्ट और दूरस्थ अर्थव्यवस्थाओं की ओर अपने कदम बढ़ाने के की दिशा में आगे बढ़ रही है। जाहिर तौर पर नई दिल्ली ने पिछले कुछ  वर्षों में भारत अमेरिका के पड़ोस में अपनी पैठ बनाने में लगा है। व्यापार समझौतों पर हस्ताक्षर करने और छूटे हुए राष्ट्रों के साथ अधिक संलग्न होने के लिए भारत अंततः सही रास्ते पर है। भारत ने चालू वित्त वर्ष 2021-22 में 400 अरब डॉलर के सामान का निर्यात कर नया रिकॉर्ड बनाया है। खास बात है कि अप्रैल, 2021 से मार्च, 2022 के लिए बनाए निर्यात लक्ष्य को चालू वित्त वर्ष खत्म होने के नौ दिन पहले ही हासिल कर लिया गया। इससे पहले 2018-19 में सबसे ज्यादा 330.07 अरब डॉलर मूल्य के वस्तुओं और सेवाओं का निर्यात किया गया था। हालाँकि, यह ध्यान देने योग्य बात है कि भारत का 6.48 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात जापान (6.1 बिलियन यूएस डॉलर) और थाईलैंड (5.7 बिलियन यूएस डॉलर) जैसे एफटीए भागीदारों से अधिक है। इसके अलावा, मैक्सिको को 4.4 अरब अमेरिकी डॉलर का निर्यात कनाडा (3.7 बिलियन अमेरिकी डॉलर) या रूस (3.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर) के निर्यात से अधिक था। इसके विपरीत, लैटिन अमेरिकी देशों में भारत ज़्यादातर कार, मोटरसाइकिल, फार्मास्युटिकल उत्पाद, जैविक और गैर-कार्बनिक रसायन और कपड़ों का निर्यात करता है। 

लैटिन अमेरिका में बढ़ा भारत का व्यापार

लैटिन अमेरिका अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए ‘गोल्डीलॉक्स ज़ोन’ में आता है। दिलचस्प बात यह है कि लैटिन अमेरिकी अर्थव्यवस्थाएं भारत के पिछड़े हुए ‘दक्षिण-सहयोग’ को पंख प्रदान करने के लिए बहुत संभावनाएं रखताहैं।  लैटिन अमेरिका में भारत से निर्यात के मामले में ब्राजील 6.49 बिलियन डॉलर के साथ पहले स्थान पर है। 2020-21 से इस वर्ष निर्यात में 53% की वृद्धि दर्ज हुई है। इसके अलावा, मेक्सिको जो लैटिन अमेरिकी देशों की सूची में दूसरे स्थान पर है। मेक्सिको ने भी भारत से 43% की वृद्धि के साथ 4.42 बिलियन डॉलर का सामान आयात किया। नतीजतन, लैटिन अमेरिकी क्षेत्र में तीन प्रमुख व्यापार ब्लॉकों का निर्यात मर्कोसुर को 8.28 बिलियन, पैसिफिक एलायंस को 7.88 बिलियन और CAFTA (मध्य अमेरिका और डोमिनिकन गणराज्य) को 1.95 बिलियन के अलावा हुआ। वर्तमान स्थिति ये साफ इशारा करती है कि भारत की लैटिन अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं में काफी सकारात्मक छवि है और ये राष्ट्र भी आशावाद की किरण के साथ भारत की ओर देखते हैं।  हालाँकि, दूसरी तरफ, भारत का निर्यात अभी भी इस क्षेत्र में कुल आयात का केवल 5% है, लेकिन भारत की कोशिश इसे धीरे-धीरे विस्तार देने की हैं, जिससे लैटिन अमेरिका पर अपनी पकड़ मजबूत की जा सके। इसके अलावा, भारतीय विदेश नीति को अधिक लैटिन अमेरिका -केंद्रित नीतियों को विकसित करने की आवश्यकता है।

लैटिन अमेरिका को लेकर पिछली सरकारों का स्टैंड

लैटिन अमेरिका वो क्षेत्र रहा है जहां हमेशा से भारतीय राजनेताओं ने सबसे कम दौरा किया है और एशिया (या मध्य एशिया सहित किसी भी उप-क्षेत्र), अफ्रीका और यूरोप के मुक़ाबले इस क्षेत्र को लेकर दिल्ली के साउथ ब्लॉक (जिसमें प्रधान मंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय हैं) में बहुत कम ध्यान दिया जाता है। इस मामले की विडंबना यह है कि भारत केवल ‘अर्जेंटीना, ब्राजील, पैराग्वे और उरुग्वे से मिलकर एक दक्षिण अमेरिकी समूह चिली और मर्कोसुर’ के साथ ‘अधिमान्य व्यापार समझौते (पीटीए)’ का आनंद लेता है, जिसका अर्थ है कि थोड़े से द्विपक्षीय संबंधों तक ही ये दायरा सीमित है। फिर भी, भारत का निजी क्षेत्र न केवल अपनी पैठ बनाने में सफल रहा है बल्कि लैटिन अमेरिका में भी फला-फूला है। अफसोस की बात यह है कि यह क्षेत्र लंबे समय तक भारत इस ‘भू-अर्थशास्त्रीय’ क्षेत्र से अछूता रहा। हालाँकि, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि मोदी सरकार ने अब अपना ध्यान इस क्षेत्र पर केंद्रित करना शुरू कर दिया है। डॉ. एस. जयशंकर की पिछली यात्रा हो, या राज्य मंत्री मीनाक्षी लेखी की हाल की इस क्षेत्र की यात्रा, ऐसा लगता है कि भारत के विदेश मंत्रालय ने इस क्षेत्र में उपलब्ध संभावनाओं को टटोलना शुरू कर दिया है। इस क्षेत्र में न केवल महान आर्थिक संभावनाएं हैं बल्कि भारत के लिए भी महान भू-राजनीतिक महत्व भी है। -अभिनय आकाश

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