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ग़ाज़ा में युद्ध और विस्थापन की पीड़ा से त्रस्त फ़लस्तीनी महिलाओं व लड़कियों की दास्तान | ‘Our strength is all we have left’

ग़ाज़ा में युद्ध और विस्थापन की पीड़ा से त्रस्त फ़लस्तीनी महिलाओं व लड़कियों की दास्तान | ‘Our strength is all we have left’

“इस युद्ध ने मेरी ज़िन्दगी हमेशा के लिए बदल दी है. हमें बार-बार विस्थापित होना पड़ा है, जिससे मेरी शिक्षा और मेरे दोस्त छिन गए. जिस डर के साथ हम जी रहे हैं, उसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता.”

ये शब्द हैं 14 साल की लीन नाहल के, जो इतनी छोटी सी उम्र में ही ग़ाज़ा में पाँच युद्ध देख चुकी हैं और कई बार विस्थापित होने को मजबूर हुई हैं.

लीन नाहल बताती हैं, “पहले हम खाना, फल, और कपड़े ख़रीदने में सक्षम थे; अब हम आठ लोग एक अस्थाई तम्बू में सिमट कर रहने को मजबूर हैं. मुझ पर ज़िम्मेदारियों का इस तरह बोझ आ पड़ा है, जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.”

लीन नाहल एक समय पर अपनी कक्षा की सबसे होनहार छात्रा थी, लेकिन 2023 के अन्त में युद्ध बढ़ने के बाद उनकी ज़िन्दगी पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गई. उनके अनेक उसके दोस्त और सहपाठी ग़ाज़ा छोड़कर अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए विदेश चले गए.

वो कहती हैं, “अब मैं तम्बू में बैठी हूँ, मेरी किताबें, स्कूल की वर्दी और बैग सब ग़ायब हो चुके हैं. ऐसा महसूस होता है जैसे मेरा भविष्य, मेरी शिक्षा और मेरा बचपन मुझसे छिन गया है.”

“मेरा सपना है कि यह युद्ध ख़त्म हो और मैं बड़ी होकर इतिहास की शिक्षिका बनूँ, और फ़लस्तीन के इतिहास व हमारे कभी न ख़त्म होने वाले दर्द की कहानी सबको सुना सकूँ.”

85 वर्षीय अल गौरानी, फ़लस्तीनी महिलाओं की उस पीढ़ी से हैं, जिन्होंने युद्ध और विस्थापन की पीड़ा सही है.

© UN Women/Suleiman Hajj

इस युद्ध ने ग़ाज़ा के सभी लोगों को प्रभावित किया है, चाहे वो नाहल जैसी छोटी बच्चियाँ हों या थुराया अल गौरानी जैसी बुज़ुर्ग महिलाएँ.

85 वर्ष की थुराया अल गौरानी कहती हैं, “मेरा जीवन की रूप-रेखा, विस्थापन ने ही निर्धारित की है.”

“मुझे 1948 का वो दिन आज भी याद है, जब मेरे पिता ने हमें, जल्दबाज़ी में हेब्रोन और ग़ाज़ा के बीच स्थित एक छोटे से गाँव, अल फ़लूजा छोड़कर भागने के लिए कहा था. उस समय इसराइली सशस्त्र बल नज़दीक आ रहे थे. हम अपना सब कुछ पीछे छोड़कर ख़ान यूनिस भाग आए थे.”

अल गौरानी ने तब से लेकर आज तक, सात युद्ध देखे हैं. 

उन्होंने बताया कि हर बार जब उनका परिवार विस्थापित हुआ, तो यह मालूम नहीं होता था कि जब वे वापस लौटेंगे, तो उनका घर बचा होगा या नहीं.

उन्होंने कहा, “हर बार मानो हमारी गरिमा पर प्रहार होता. वर्तमान युद्ध सबसे निर्दयी व क्रूर है, और अब तक के सभी युद्धों से अधिक लम्बा खिंच रहा है.”

ग़ाज़ा में चल रहे विनाशकारी युद्ध के दौरान, UN Women ने जीवन के हर क्षेत्र से अनगिनत महिलाओं और लड़कियों की दर्द भरी आपबीतियाँ सुनीं.

पैरामेडिक के तौर पर काम करने वाली नीवीन को, नवम्बर 2023 में एक ही दिन में अपने परिवार के 80 सदस्यों को खो देने के दर्द से गुज़रना पड़ा है.

मगर इसके बावजूद उन्होंने अपना काम जारी रखा है. उन्हें कई बार विस्थापन और भयावह घटनाओं का सामना करना पड़ा है, जैसेकि कमाल अदवान अस्पताल का विनाश तथा जबालिया में UNRWA शरणस्थल पर बमबारी, जहाँ उन्होंने शरण ली थी.

अपने बच्चों के साथ, अमानी अल डर्बी.

© Courtesy of Amani Al Derbi

ग़ाज़ा स्वास्थ्य मंत्रालय में मनोचिकित्सक, अमानी वर्षों के युद्ध व टकराव से पीड़ित लोगों को सांत्वना देने का काम कर रही थीं. युद्ध से पहले उनका सपना छात्रवृत्ति लेकर पीएचडी की शिक्षा हासिल करने का था. लेकिन मई 2024 में एक इसराइली हवाई हमले में अमानी और उनके चार बच्चों की मौत हो गई.

इबतिसम व्हीलचेयर का उपयोग करती हैं, लेकिन अब उन्हें सोने के लिए एक उचित बिस्तर भी उपलब्ध नहीं हैं और वह ग़ाज़ा की नष्ट हुई, दुर्गम सड़कों पर चलने में असमर्थ हैं. 

आश्रय सुविधाओं में विकलांग व्यक्तियों की मदद के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी के कारण, उन्हें अपनी माँ से भी अलग कर दिया गया है.

इस बीच, पश्चिमी तट में फ़लस्तीनी महिलाएँ और लड़कियाँ भी गम्भीर चुनौतियों व बोझ का सामना कर रही हैं.

49 वर्षीय विधवा काफ़ा अबू हर्ब, तीन बच्चों की माँ हैं. उन्होंने पश्चिमी तट में इसराइली क़ब्ज़े के बीच जीवन जीने के दौरान जिन कठिन चुनौतियों का सामना किया है, उनकी कहानी सुनाई.

काफ़ा अबू हर्ब का कहना है, “[इसराइली] सैनिक हमारे घरों में घुस आते हैं, हमारी निजता का हनन करते हैं, हमें पूछताछ के लिए घसीटकर ले जाते, और बिना किसी कारण या वारंट के हमारे बच्चों को रात के अंधेरे में उठा कर ले जाते हैं. यही हमारी वास्तविकता है.”

“मेरे बेटों में से एक अब भी जेल में है, बिना किसी आरोप या सुनवाई के. हम इतना सब कुछ हम किस तरह सहन करें?”

फ़लस्तीन में महिलाएँ और लड़कियाँ अलबत्ता बेहद क्रूर परिस्थितियों का सामना कर रही हैं, मगर उन्होंने अब भी उम्मीद नहीं छोड़ी है.

वो कहती हैं, “हम ज़्यादा कुछ नहीं मांगते—बस शान्ति से जीने का अधिकार, बिना डर के साँस लेने का अधिकार चाहते हैं.” 

“फ़लस्तीनी महिलाओं ने इस पीड़ा का सर्वाधिक बोझ सहन किया है, फिर भी हम अब भी यहाँ हैं. अब भी अपने पैरों पर खड़ी हैं. हमारे पास कुछ बचा है तो केवल अपनी ताक़त.”

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