राजनीति

जब अटल ने भांप लिया लिफाफे का मजमून, मुलायम के ‘दांव’ में फंसे राजीव, पढ़ें दिलचस्‍प सियासी किस्‍से – atal bihari vajpayee story read old political kissa of sonia gandhi mulayam singh yadav rajiv gandhi

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बात 1998 की है। अटल बिहारी वाजपेयी दूसरी बार प्रधानमंत्री बने थे। इस बार उनकी अगुवाई में NDA का दायरा बड़ा था। इसमें जयललिता की AIADMK भी शामिल थी। सरकार के काम शुरू करते हुए ही सियासी संकट शुरू हो गया। जयललिता की पार्टी से तीन सांसद केंद्र में मंत्री बनाए गए। इसमें भूतल परिवहन मंत्री बने सदापति आर. मथैया के खिलाफ पद संभालते ही भ्रष्टाचार का एक मामला खुल गया। चेन्नै की एक अदालत ने अवैध तरीके से संपत्ति अर्जित करने के आरोप में उन्हें समन जारी किया। वाजपेयी के दोबारा पीएम बने अभी दो हफ्ते भी नहीं हुए थे और सरकार की साख सवालों के घेरे में थी। लिहाजा उन्होंने मथैया से इस्तीफा लेकर उन्हें मंत्रिमंडल से मुक्त कर दिया। मथैया महज एक महीने मंत्री रह पाए।

जब अटल ने पूछा लिफाफे का मजमून

जब अटल ने पूछा लिफाफे का मजमून

मथैया जयललिता के करीबी थे। उनके इस्तीफे से वह नाराज हो गईं। उन्होंने अटल को चिट्ठी लिखी कि मंत्रिमंडल के सदस्य बूटा सिंह, आरके हेगड़े और राम जेठमलानी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उन्हें भी बर्खास्त किया जाए। बीजेपी के कई नेताओं ने अलग-अलग मुलाकात में जयललिता को मनाने की कोशिशें कीं, लेकिन संकट जारी रहा। आखिरकार, दूरसंचार मंत्री बूटा सिंह भी मंत्रिमंडल से हटा दिए गए। गतिरोध के बीच कुछ शांति हुई, लेकिन AIADMK कोटे के मंत्रियों से मतभेद खत्म नहीं हुए। वाजपेयी से पूछकर वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा जयललिता से मिलने चेन्नै गए। काफी देर बातचीत और सामान्य औपचारिकताओं को निभाने के बाद जब जयललिता यशवंत सिन्हा को बाहर छोड़ने आईं तो उन्होंने एक लिफाफा पकड़ा दिया।

सिन्हा ने उसे कोट की जेब में डाल लिया और दिल्ली आकर अपने दफ्तर में खोला। इसमें कुछ नई मांगे थीं और जयललिता के खिलाफ चल रही कुछ जांचों की लिस्ट थी। अपेक्षा साफ थी, लेकिन सिन्हा ने लिफाफा किनारे रखा और अटल से मिलने चले गए। अटल को उन्होंने मुलाकात की सारी बातें बताईं और चुप हो गए। अटल फिर भी मुस्कराते हुए यशवंत को देखते रहे। जब उन्होंने कुछ नहीं बोला तो अटल ने ही पूछ लिया ‘आपने लिफाफे की चर्चा नहीं की?’ सिन्हा को अंदाजा भी नहीं था कि अटल को इसकी जानकारी थी। बाद में जयललिता ने समर्थन वापस ले लिया और अटल की 13 महीने की सरकार एक वोट से गिर गई।

कांग्रेस की टूट-फूट

कांग्रेस की टूट-फूट

1992 में अयोध्या में विवादित ढांचे के ध्वंस के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के खिलाफ सरकार और कांग्रेस में विरोध के सुर तेज हो गए थे। उन पर राजीव गांधी की हत्या की जांच में देरी के भी आरोप थे। राव को लेकर एक और विवाद प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष का पद एक साथ संभालने का भी था। कांग्रेस के भीतर एक खेमा इसको लेकर मुखर था कि पार्टी में एक व्यक्ति-एक पद का सिद्धांत लागू है, लेकिन राव पद छोड़ने को तैयार नहीं थे। 1994 में सूरजकुंड में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में अर्जुन सिंह गुट ने इसके खिलाफ प्रस्ताव पास कराने की कोशिश की, लेकिन यह खुद उन पर भारी पड़ गया। उसने प्रस्ताव पास करा दिया कि प्रधानमंत्री के पद के संदर्भ में ‘एक व्यक्ति, एक पद’ की व्यवस्था लागू नहीं होनी चाहिए। हालांकि, गतिरोध खत्म नहीं हुआ।

कांग्रेस की असंतुष्ट लॉबी ने 19 मई 1995 को तालकटोरा स्टेडियम में राव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। अर्जुन सिंह, एनडी तिवारी, माखनलाल फोतेदार वगैरह ने मिलकर कांग्रेस (तिवारी) गुट बनाया। इसमें इंदिरा गांधी की करीबी रहीं मोहसिना किदवई भी शामिल थीं। तालकटोरा स्टेडियम में हुए सम्मेलन के पहले मोहसिना से मिलकर फोतेदार ने कहा कि सोनिया गांधी चाहती हैं, आप राव विरोधी खेमे का हिस्सा बनें क्योंकि वह उनके कामकाज से संतुष्ट नहीं हैं। इसका खुलासा खुद मोहसिना किदवई ने अपनी बायोग्राफी ‘माय लाइफ इन इंडियन पॉलिटिक्स’ में किया है। मोहसिना ने यह भी माना है कि तिवारी गुट में शामिल होना उनका गलत फैसला था। फोतेदार पर भरोसा करने से पहले उन्हें सोनिया गांधी से बात करनी चाहिए था कि वास्तव में उन्होंने ऐसा कुछ कहा था क्या? सोनिया ने इस टूट पर कभी कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की। 24 अगस्त 1995 को अमेठी की जनसभा में उन्होंने राजीव गांधी के हत्यारोपियों के ट्रायल में देरी पर जरूर सवाल उठाए थे। 1998 में जब सोनिया अध्यक्ष बनीं तो अधिकांश चेहरे फिर कांग्रेस में वापस आ गए।

मुलायम के ‘दांव’ में फंसे राजीव

मुलायम के ‘दांव’ में फंसे राजीव

यूपी की सियासत में 1989 में दिलचस्प मोड़ आए। कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और जनता दल के लिए संभावनाएं खुलीं। केंद्रीय नेतृत्व ने नाम तय किया चौधरी चरण सिंह के बेटे अजित सिंह का और मुलायम को डिप्टी सीएम बनने का ऑफर मिला। ऐन मौके पर मुलायम ने चेहरे के चयन के लिए मतदान का दांव खेला और पांच वोटों से मुख्यमंत्री की रेस में अजित सिंह को पीछे छोड़ दिया। बीजेपी की मदद से बहुमत हासिल कर मुलायम पहली बार सीएम बने। हालांकि महज एक साल बाद ही अयोध्या में कारसेवकों पर पुलिस फायरिंग के बाद बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया। कांग्रेस के अपने ‘शुभचिंतकों’ की मदद से मुलायम ने राजीव गांधी से समर्थन की गुजारिश की।

मुलायम ने भरोसा दिलाया कि यूपी में आप हमारी मदद करिए, आगे दिल्ली में हम आपकी मदद करेंगे। मुलायम ने सरकार बचा ली, लेकिन ‘हिंदू विरोध’ का आरोप झेल रही कांग्रेस को दोहरा झटका लगा। अयोध्या प्रकरण से हिंदू वोट तो उससे खिसके ही, इस मामले में मुलायम की सक्रियता ने अल्पसंख्यक वोटों को भी कांग्रेस के पाले से खिसका दिया। समर्थन लेने के कुछ महीनों बाद ही मुलायम ने सीएम पद से इस्तीफा देकर विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर दी। इसके साथ ही कांग्रेस के यूपी की सत्ता में लौटने के दरवाजे भी लंबे समय के लिए बंद हो गए।

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