विश्व

ग़ाज़ा: युद्ध के जारी रहने से, बिखर रहा है सामाजिक ताना-बाना

एंड्रिये डे डोमेनिको, क़ाबिज़ फ़लस्तीनी इलाक़े में मानवीय सहायता मामलों में संयोजन के लिए यूएन कार्यालय के प्रमुख हैं, और उन्होंने हाल ही में तीन सप्ताह ग़ाज़ा पट्टी में बिताए. दक्षिणी ग़ाज़ा के रफ़ाह शहर में इसराइली सैन्य कार्रवाई में तेज़ी आने की वजह से वहाँ शरण ले रहे क़रीब 10 लाख लोगों ने पिछले कुछ दिनों में पलायन किया है. 

OCHA के वरिष्ठ अधिकारी ने न्यूयॉर्क में पत्रकारों को जानकारी देते हुए कहा कि मानवीय सहायताकर्मियों के कामकाज के लिए हालात बेहद ख़तरनाक व चुनौतीपूर्ण हैं.

एंड्रिये डे डोमेनिको के अनुसार, ग़ाज़ा तक मानवीय सहायता पहुँचाना एक बड़ी मुश्किल है, मगर ज़रूरतमन्दों तक सुरक्षित ढंग से उसे वितरित करना भी चुनौती साबित हो रहा है. 

उन्होंने कहा कि ग़ाज़ा में क़ानून व्यवस्था दरक चुकी है. इस क्रम में, उन्होंने दो दिन पहले हुई एक घटना का उल्लेख किया, जब 70 फ़ीसदी मानवीय सहायता क़ाफ़िला अपने गंतव्य स्थान तक नहीं पहुँचा, चूँकि उसे आपराधिक गुटों और ज़रूरतमन्द लोगों द्वारा लूट लिया गया.

एंड्रिये डे डोमेनिको ने बताया कि ग़ाज़ा में उन्होंने जबरन विस्थापित हुए लोगों को देखा. 15 मिनट की यात्रा करने में एक घंटे तक का समय लग रहा है. तटीय इलाक़े में बड़ी संख्या में ग़ाज़ावासी अपने शिविरों में पसरी गर्मी के कारण वहाँ कुछ देर बैठे थे.

सामाजिक ताने-बाने पर असर  

यूएन मानवतावादी अधिकारी ने कहा कि ग़ाज़ा में गुज़र-बसर के लिए विकट हालात से स्थानीय समुदाय त्रस्त है और सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है.

उन्होंने स्थानीय लोगों के आदर-सत्कार की भावना को याद करते हुए कहा कि फ़लस्तीनी समाज में अतिथियों की आवभगत, लोगों के बीच सामाजिक जुड़ाव एक बुनियादी बात है. मगर मौजूदा हालात में यह दरक रहा है.

यूएन अधिकारी ने कहा कि फ़िलहाल ताक़तवर का ही बोलबाला है, और जीवित रहने के लिए लोगों के पास इतना कम बचा है कि केवल शक्तिशाली लोगों की ही वहाँ तक पहुँच है.

ग़ाज़ा में बुनियादी सामान व सेवाओं, ज़रूरी औज़ारों, सामग्री व उपकरण की क़िल्लत से जीवन और कठिन हो गया है और लोगों को खाना पकाने में भी कठिनाइयों से जूझना पड़ रहा है.

हिंसा व सदमा

एंड्रिये डे डोमेनिको ने कहा कि उनके लिए यह सोच पाना मुश्किल है कि स्थानीय बच्चे, जो निरन्तर इस अकल्पनीय सदमे से गुज़र रहे हैं, वो इससे किस तरह उबर पाएंगे.

ग़ाज़ा के स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, अब तक 36 हज़ार फ़लस्तीनियों की जान गई है और 80 हज़ार से अधिक घायल हुए हैं.

स्वास्थ्य प्रणाली बेहद दबाव में काम कर रही है और अनेक इलाक़ों में फ़ील्ड अस्पतालों पर निर्भर रहना पड़ रहा है, यानि स्थानीय आबादी का पर्याप्त सुविधा व सेवाओं में उपचार नहीं किया ज सकता है. 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने ग़ाज़ा के मध्य इलाक़े और ख़ान यूनिस में स्वास्थ्य सेवाओं को फिर से बहाल करने के लिए विशाल प्रयास किए हैं, मगर फ़िलहाल रफ़ाह में अब किसी भी अस्पताल में कामकाज नहीं हो पा रहा है.

इसके अलावा, पर्याप्त संख्या में टैंट, तिरपाल और आश्रय के लिए अन्य सामान व उपकरणों की व्यवस्था करना चुनौतीपूर्ण है. फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए यूएन एजेंसी द्वारा विस्थापितों के लिए 36 स्थलों का संचालन किया जा रहा है, मगर अब यह सेवा ठप है. 

वहीं, ग़ाज़ा की सड़कों पर ठोस कचरा बड़ी मात्रा में जमा हो गया है. आम तौर पर कचरा भराव क्षेत्र इसराइल या मिस्र की सीमा से लगी दीवार पर स्थित है, मगर अब उन इलाक़ों में जाना सम्भव नहीं है और इसलिए नए स्थानों की तलाश की जा रही है. 

बच्चों के लिए चिन्ता

यूएन के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि क़रीब छह लाख बच्चों ने 7 अक्टूबर को लड़ाई शुरू होने के बाद से अब तक स्कूल का रुख़ नहीं किया है. 

इस क्रम में, एंड्रिये डे डोमेनिको ने स्थानीय और अन्तरराष्ट्रीय ग़ैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए जा रहे प्रयासों की सराहना की, जो तमाम अवरोधों और ख़तरों के बीच ज़रूरी समर्थन प्रदान कर रहे हैं.

बताया गया है कि केरेम शेलॉम सीमा चौकी के ज़रिये मानवीय सहायताकर्मियों की टीम की आवाजाही होती है. इसे UNRWA वाहनों में केवल अन्तरराष्ट्रीय वाहन चालकों के साथ संचालित किया जाता है.

हाल ही में 13 घंटे की प्रतीक्षा के बाद सात वाहनों के क़ाफ़िले को जाने की अनुमति मिली थी, मगर उसे अन्तिम क्षण पर रोक दिया गया.

एंड्रिये डे डोमेनिको ने कहा कि उस स्थान तक पहुँचने के लिए हमें एक ऐसी सड़क से गुज़रना था, जिसे अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है, भले ही वो बार-बार गोलीबारी की चपेट में आई हो.

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